Monday, September 6, 2010

बालगीत





          हिन्दी

हिन्दी तन है हिन्दी मन है
हिन्दी ही जीवन का धन है
हिन्दी भारत के कण कण में
हिन्दी ही संपूर्ण वतन है.

नहीं तेलगू पंजाबी में  
अरे यहाँ कोई बन्धन है
न ही हिन्दी गुजराती में
बिल्कुल यहाँ कोई अनबन है.

उर्दू मेहके कन्नड़ चेहके
सारा भारत देश चमन है
कहीं मराठी कहीं बांगला
सब मेहके जैसे चन्दन है़.

भाषायें तो सभी अलग हैं
किन्तु सभी का एक चलन है
भले कुण्डली भिन्न भिन्न हो
किन्तु सभी की एक लगन है.

भारत की सब भाषाओं को
हिन्दी का हर रोज नमन है
सब भाषायें बहिनें बहिनें
हिन्दी सबकी बड़ी बहन है.

धरती पर सब लहराती हैं
हिन्दी बहती संग पवन है
बच्चो सदा ध्यान यह रखना
हिन्दी भाषा जन गण मन है.



मामा के घर 

छुट्टी में भई कहाँ चलेंगे
मामा के घर मामा के घर
मस्ती जाकर कहाँ करेंगे
मामा के घर मामा के घर

आम खायेंगे मामा के घर
जाम खायेंगे मामा के घर
बड़े संतरे कहाँ मिलेंगे
मामा के घर मामा के घर

बाग बगीचे मामा के घर
बाग गलीचे मामा के घर
क्रिकेट मैच कहाँ खेलेंगे
मामा के घर मामा के घर

गन्ने खायें मामा के घर
होला खायें मामा के घर
ठंडी लस्सी कहाँ पियेंगे
मामा के घर मामा के घर

खेत जायेंग मामा के घर
चने खयेंगे मामा के घर
रोज पेड़ पर कहाँ चढ़ेंगे
मामा के घर मामा के घर

खूब हँसेंगे मामा के घर
शोर करेंगे मामा के घर
दूध किलो भर कहाँ पियेंगे
मामा के घर मामा के घर




 कैसा रिश्वतखोर आदमी

यह मोटा इंसान खड़ा है  
देखो इसका पेट बड़ा है


कल तक था बिल्कुल कंगाल
आज हो गया मालामाल


जब भी कसकर भुखियाता है
रोटीनहीं नोट खाता है


यह है पक्का रिश्वतखोर
नहीं किसी का इस पर जोर


पानी सदा स्वच्छ पीना


पानी गंदा आया नल   में
पी बीमार हुआ दो पल में


उसको उल्टी दस्त हो गये
हाथ पैर भी लस्त हो गये


पानी सदा साफ पीना है
स्वस्थ रहो लंबा जीना है


गंदा है तो रोज उबालो
थोड़ी जरा फिटकरी डालो


देखो यह मजदूर की बेटी
गंदे बिस्तर पर है लेटी


उसके पिता समोसे लाये
दोनों ने मिलकर के खाये


ये दोनों बीमार हो गये
ज्वर के तीव्र शिकार हो गये


गंदी चाट कभी न खाओ
खुद समझो सबको समझाओ



     जंगल

पीपल नीम आम के जंगल
होते बड़े काम के जंगल |
कितने निश्छल भोले भाले
होते तीर कमान के जंगल |
कभी कभी क्यों हो जाते हैं
बारूदी अंजाम के जंगल |
बच्चो कभी न बनने देना
ओसामा सद्दाम के जंगल |
वंशी की मधु तान सुनाते
नटनागर घनश्याम के जंगल |
रामायण के पाठ पढ़ाते
सीता राजा राम के जंगल |
बिल्कुल एक सरीखे दिखते
राम और रहमान के जंगल |
प्रेम दया करुणा सिखलाते
कृष्ण भक्त रसखान के जंगल |
सत्य अहिंसा क्षमा रटाते
श्रद्धा के गुरू नाम के जंगल |
भारत के जयनाद गुंजाते
केरल तक आसाम के जंगल |
अमर रहे गणतंत्र हमारा
गाते हिन्दुस्तान के जंगल |


दादी को समझाओ जरा


मुझे कहानी अच्छी लगती
कविता मुझको बहुत सुहाती
पर मम्मी की बात छोड़िये
दादी भी कुछ नहीं सुनातीं
पापा को आफिस दिखता है
मम्मी किटी पार्टी जातीं
दादी राम राम जपती हैं
जब देखो जब भजन सुनातीं
मुझको क्या अच्छा लगता है
मम्मी कहां ध्यान देती हैं
सुबह शाम जब भी फुरसत हो
टी वी से चिपकी रहती हैं
कविता मुझको कौन सुनाये
सुना कहानी दिल बहलाये
मेरे घर के सब लोगों को
बात जरा सी समझ न आये
कोई मुझ पर तरस तो खाओ
सब के सब मेरे घर आओ
मम्मी पापा और दादी को
ठीक तरह से समझाओ



चांद पे बुढ़िया रहती क्यों है

चांद युवाओं की बस्ती है
चांद पे बुढ़िया क्यों रहती है
पता नहीं युवकों की पीढ़ी
यह गुस्ताखी सहती क्यों है |

पूर्ण चंद्र पर जाने कब से
डाल रखा है उसने डेरा
सदियों सदियों से देखा है
जग ने उसका वहीं बसेरा
जाये तपस्या करने वन में
वहां पड़ी वह रहती क्यों है |

किस्से इश्क मोहब्बत के सब
इसी चांद से तो जन्मे हैं
लिखे प्यार की हर पुस्तक में
इस पर ढेर ढेर नगमें हैं
वृद्दों का क्या काम वहां पर
बुढ़िया नहीं समझती क्यों है |

इश्क प्यार करने वालों को
यह अतिक्रमण हटाना होगा
किसी तरह से भी बुढ़िया को
स. सम्मान हटाना होगा
दिलवालों की नगरपालिका
शीघ्र नहीं कुछ करती क्यों है |

प्रतिदिन चक्की पीस पीस कर
कितना आटा रोज गिराया
गिरा चांदनी बनकर आटा
जिसमें सारा विश्व् नहाया
आटा बनती यही चांदनी
सोचो झर झर झरती क्यों है |

कहती बुढ़िया घोर परिश्रम
सदियों से करती आई हूं
इस आटे को बना चांदनी
जग में बिखराती आई हूं
पर दुनियां ने कभी न सोचा
दुख तकलीफें सहती क्यों है |


युगों युगों से उस बुढ़िया ने
जग को अपना वंशज माना
उनकी खुशियों की खातिर ही
जारी है आटा बिखराना
अब तो समझो हे जगवालो
बुढिया यह सब करती क्यों है |

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