Monday, September 6, 2010

बुन्देली कविता




गज़ल{ बुंदेली में }

हमने जीपे करो भरोसो ओई उलट गयो |
सबके सामू वादा करकें खुदई पलट गओ |

बड़े जतन सें पाल पोस कें बड़ो करो तो
मोरो मुरगा ऊके घर में जाकें कट गओ|

ऐसी चली पवन पुरवाई संभल ने पाई
बड़ी जतन सें ढको ढकाओ घूंघट हट गओ|

आस लगाएं कब से एकटक ऊपर तक रये
पता नहीं का कारन कारो बदरा छट गओ|

इन नेतन पे काये लच्छमी ऐसी बरसे
ठूंस ठूंस कें के नोट जेब में,कुरता फट गओ|

पीदयाल को मान हतो पूरे कुनबा में
बन गये राजा हरिश्चंद्र सो पूरो घट गओ|

गज़ल

भौत दिनों के बाद मिली तीं|
गुईंयाँ गुईंयाँ दोई जुरीं तीं |

एई बात पे भई ती चर्चा
किस पे कब कब कौन मरीं तीं |

मोहन सोहन श्यामू रामू
किस के पीछे कौन परीं तीं|

नई पुरानी कितनी बातें
याद आईं भूली बिसरी तीं|

गंगू के संग भूरी मेडम
रंगे हाथ गईं पकरीं तीं|

कितनी यादें कितनी बातें
सारी रात नहीं अफरीं तीं|

स्मृतियों को सुना सुनाकर
हँसकर हुईं जातीं दुहरीं तीं|

आखिर बतया बतया हारीं
खा पीकें खूबै डकरीं तीं|

पी दयाल ने भीतर झाँको
ओड़ तान कें दोई परीं तीं|
|


घर में पानी नईंयाँ

       जो सूरज ऐसो तप रओ है
       उर घर में पानी नईंयाँ|
       मोरे घर में पानी नईयाँ
       मोरे घरपानी नी नईंयाँ
       जो सूरज ऐसो तप रओ है
       उर घर में पानी नईंयाँ|

       कुआ डरो है सूखो
       हेंडपंप हो गओ रूखो|
       सरकारी नल तो कब सें
       बैठो है रूठो रूठॊ|
       प्यासो बैठो मोरो सैंयाँ री
       मोरे घर में पानी नईंयाँ|

       कल नदिया तक मैं गई ती
       दो कोस निगत थक गई ती|
       जंगल में डर के मारें
       तो सांस मोरी रुक गई ती|
       अरे सूज गये मोरे पईंयाँ री
       मोरे घर में पानी नईंयाँ|

      ये सोच सोच घबराऊं
     कि पानी कहाँ से लाऊँ|
     मैं नई नवेली दुल्हन
     मटका लेकें कित जाऊँ|
     न ठौर  दिखे न ठैंयाँ री
     मोरे घर में पानी नईंयाँ|

     तीन मील उत्तर में
     एक कुआ बनो है घर में|
     घर मालक की नजरों सें
    मोय डर लागत है उर में|
    कोऊ संग चलो मोरी गुंईयां री
     मोरे घर में पानी नईंयाँ|

     सार में ढोर रंभा रये
     पानी पानी चिल्ला रये|
    नदिया तलाब पोखर तो
     अब बिल्कुल सूखे जा रये|
    प्यासी मर रईं मोरी गैंयाँ री
     मोरे घर में पानी नईंयाँ|

एक हेंड पंप तक जा रई
और नल तक दौड़ लगा रई|
पेभीड़ खूब होबे सें
मटकी तक भर ने पा रई|
है कैसी भूल भुलईंयाँ री
मोरे घर में पानी नईंयाँ|

पानी हज़ार फुट नेंचें
अब कैसें ऊपर खेंचें|
कहाँ सपरबे जाबें
और कपड़ा कैसें फींचें|
कोऊ काये सोचत नईंयाँ री
मोरे घर में पानी नईंयाँ|

भओ धुंआँ बहुत जहरीलो
कैसो अम्बर तक फैलो|
जंगल कटबे के कारण
मौसम हो गओ विषेलो|
नज़दीक नास की घड़ियां री
मोरे घर में पानी नइंयां|

अब एकऊ पेड़ ने काटो
पानी मिलजुर कें बांटो|
एक बूँद ने व्यर्थ बहाओ
जंगल बिल्कुल ने छांटो|
कौनऊ उपाय अब नईंयाँ री
मोरे घर में पानी नईंयाँ|



              सरस्वती वंदना
         जीखों पूजे धरा जीखों पूजे गगन
           ऐसी विद्या की देवी खों मोरो नमन|
 
        जीकी पूजा में ठांड़ो जो संसार है
          जीके हाथों में वीणा की झंकार है
          जीके कानों में कुंडल गले हार है
          जीकी आंखों में ममतामयी प्यार है
          जीमें डूबो है तन जीमें डूबो है म‌न‌
           ऐसी विद्या....
          
          हाथ में लेकें पुस्तक वे प्यारी लगें
          सारे देवी देवतन से न्यारी लगें
          धरती माता की कन्याकुमारी लगें
          वे सच्चऊँ की माता हमारी लगें
          जीके चरनों में लागी है मोरी लगन
          ऐसी विद्या..
           जीके चरनों में बुद्धि की रसधार है
           ग्यान गंगा को भरपूर भन्डार है
           जीके अर्पण में वेदों को सब सार है
           जीके दर्शन में जीवन को उद्धार है
           मन के भीतर है वेदी और बाहर हवन
           ऐसी विद्या....
 
          गीत सगीत की सर्व ग्यानी हो मां
          सब सुरीले सुरों की भवानी हो मां
          यूँ तो सदियों से हीजानी मानी हो मां
          गान कविता गज़ल और कहनी हो मां
          तुमखों झुक झुक कें पूजें साहित्यक सदन
 
         ऐसी विद्या....
          देकें मोखों आसीसें मोये तार दो
          मोरी ममतामयी मां मुझे प्यार दो
          मोपे करकें दया ऐसो उपहार दो
          आकें भीतर की आखों में साकार हो
          छोड़कें सब कछु आओ तोरी सरन
          ऐसी विद्या....
             सारी दुनियाँ खों हे माता सदग्यान दो
             दीन दुखियों खों विद्या को तुम दान दो
             बस कटेँ सबके दुख ऐसो वरदान दो
             सब पे ममता की छतरी हे मां तान दो
             होवे दुनियाँ में सुख शांति  चेनो अमन   
               ऐसी विद्या....


 

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