Tuesday, September 7, 2010

कविता

                             उनकी याददाश्त
पुलिस थाने में
होली के रंगे
साहित्यकार के विरुध्द्
प्रथम सूचना रपट
दर्ज कराई गई
और थाने के
थानेदार को दिखाई गई
तो वह गुस्से में बोला
साहित्यकार को तुरंत पककड़कार
जेल में डाल दो
मार मार कर उसका
कचूमर निकाल दो
साला सचाई और
ईमान की बातें करता है
नैतिकता का स्वांग भरता है
सच बोलना
दंदडनीय अपराध है
ईमानदांरों को नहीं
छोड़ा जा सकता
यह कानून की किताब मॆं
लिखा है
मुझे अच्छी तरह याद है

मन्त्री पद
 हाय राम में हूआ अनाथा
मन्त्री पद से छूटा नाता
हायराम में हुआ अनाथा
कुछ दिन पद पर और रह जाता
फॊरेन में खाता खुल जाता
थोडे दिन पद धरम निभाया
पांच करोड कमा ही पाया
कोठी बंगला कार बनाई
दो सौ एकड़ धरती पाई
दो बेटों को फेक्ट्री खोली
बिटिया की उठवा दी डोली
दो पीढ़ी का माल कमाया
यूं ही जीवन व्यर्थ कमाया
कुछ दिन काश और मिल जाते
दस बारह बंगले बन जाते
दस पीढ़ी का माल कमाता
थोड़ा बहुत चैन पा जाता
अब तो मुझको कुछ न भाता
हाया राम में हुआ अनाथा


मालिक के चमचे

होती जयजयकार रहेगी अब मालिक के चमचों की
जगह जगह सरकार बनेगी अब मालिक के चमचों की|
चांद सितारे सूरज जब तक टिके हुये हैं अंबर में
रोज रोज दरकार रहेगी अब मालिक के चमचों की|
कल तक जो भटके थे दर दर सड़क छाप मजनूं बनकर
अपनी खुद की कार रहेगी अब मालिक के चमचों की|
अब तो बिन मांगे ही सब कुछ घर में आता रहता है
कोठी भी तैयार रहेगी अब मालिक के चमचों की|
लंदन पेरिस न्यूयार्क में जा इलाज करवायेंगे
जब पत्नी बीमार पड़ेगी अब के चमचों की|

3 comments:

  1. पानी नहीं नहानी में [बाल कविता] - प्रभुदयाल श्रीवास्तव

    जरा ठीक से देखो बेटे
    पानी नहीं नहानी में
    तुमको आज नहाना होगा
    एक लोटे भर पानी में|

    नहीं बचा धरती पर पानी
    बहा व्यर्थ बेईमानी में
    खूब मिटाया हमने तुमने
    पानी यूं नादानी में|

    बीस बाल्टी पानी सिर पर
    डाला भरी जवानी में
    पानी को जी भरके फेका
    बिना बचारे पानी में|

    ढेर ढेर पानी मिलता था
    सबको कौड़ी कानी में
    अब तो पानी मोल बिक रहा
    पैसा बहता पानी मॆ‍‍

    कितना घाटा उठा चुके हैं
    हम अपनी मनमानी में
    नहीं जबलपुर में है पानी
    न ही अब बड़वानी में|


    ReplyDelete
  2. पानी नहीं नहानी में [बाल कविता] - प्रभुदयाल श्रीवास्तव

    जरा ठीक से देखो बेटे
    पानी नहीं नहानी में
    तुमको आज नहाना होगा
    एक लोटे भर पानी में|

    नहीं बचा धरती पर पानी
    बहा व्यर्थ बेईमानी में
    खूब मिटाया हमने तुमने
    पानी यूं नादानी में|

    बीस बाल्टी पानी सिर पर
    डाला भरी जवानी में
    पानी को जी भरके फेका
    बिना बचारे पानी में|

    ढेर ढेर पानी मिलता था
    सबको कौड़ी कानी में
    अब तो पानी मोल बिक रहा
    पैसा बहता पानी मॆ‍‍

    कितना घाटा उठा चुके हैं
    हम अपनी मनमानी में
    नहीं जबलपुर में है पानी
    न ही अब बड़वानी में|
    n main page.
    Prabhudayal Shrivastava

    ReplyDelete
  3. सूरज के कपड़े

    कई दिनों से नंगा हूं माँ,
    बड़ी लाज अब मुझको आती।
    सूरज अपनी माँ से बोला,
    क्यों न कपड़े मुझे सिलाती।

    पहिले तो छोटा था माँ मैं,
    इतनी समझ नहीं थी मुझमें,
    इस कारण से पड़ा नहीं था,
    कपड़ों के लफड़ों झफड़ों में।

    किंतु आजकल मित्र चिढ़ाते,
    मुझको बहुत सताते रहते,
    मुझे देखकर नंगा नंगा,
    जोरों से चिल्लाते रहते।

    इस कारण से वस्त्र जरूरी,
    हैं मां अब मुझको सिलवाना।
    नहीं सिले तो बंद करूंगा,
    मैं अब घर से बाहर जाना।

    माँ बोली रे प्यारे बेटे,
    कैसी तू बातें करता है,।
    तुझको नंगा बोल सके यह ,
    किसमें दम किसमें क्षमता है।

    तू तो जनम जनम‌ से बेटा,
    ऐसे वस्त्र पहिनकर आया।
    तेरे चमकीले कपड़ों ने,
    ही तो दुनियाँ को चमकाया।

    तुझे देखते ही दुनियाँ के,
    सबके सब नंगे डर जाते।
    भाग भाग कर किसी अँधेरे,
    कोने में जाकर छिप जाते।

    जो तुझको नंगा कहते हैं,
    पहिले अपना हृदय टटोलें,
    मन के नंगों को क्या हक है,
    किसी और को नंगा बोलें।

    तन का नंगापन तो केवल,
    जरा देर‌ आंखों को चुभता।
    मन के नंगेपन से दुनियां
    धू धू जलती, विश्व झुलसता।

    तन के नंगेपन पर बेटे,
    व्यर्थ कभी न रोना धोना।
    इतना ध्यान हमेशा रखना,
    मन‌ से नंगे कभी न होना।

    ---

    ReplyDelete