पुलिस थाने में
होली के रंगे
साहित्यकार के विरुध्द्
प्रथम सूचना रपट
दर्ज कराई गई
और थाने के
थानेदार को दिखाई गई
तो वह गुस्से में बोला
साहित्यकार को तुरंत पककड़कार
जेल में डाल दो
मार मार कर उसका
कचूमर निकाल दो
साला सचाई और
ईमान की बातें करता है
नैतिकता का स्वांग भरता है
सच बोलना
दंदडनीय अपराध है
ईमानदांरों को नहीं
छोड़ा जा सकता
यह कानून की किताब मॆं
लिखा है
मुझे अच्छी तरह याद है
मन्त्री पद
हाय राम में हूआ अनाथा
मन्त्री पद से छूटा नाता
हायराम में हुआ अनाथा
कुछ दिन पद पर और रह जाता
फॊरेन में खाता खुल जाता
थोडे दिन पद धरम निभाया
पांच करोड कमा ही पाया
कोठी बंगला कार बनाई
दो सौ एकड़ धरती पाई
दो बेटों को फेक्ट्री खोली
बिटिया की उठवा दी डोली
दो पीढ़ी का माल कमाया
यूं ही जीवन व्यर्थ कमाया
कुछ दिन काश और मिल जाते
दस बारह बंगले बन जाते
दस पीढ़ी का माल कमाता
थोड़ा बहुत चैन पा जाता
अब तो मुझको कुछ न भाता
हाया राम में हुआ अनाथा
मालिक के चमचे
होती जयजयकार रहेगी अब मालिक के चमचों की
जगह जगह सरकार बनेगी अब मालिक के चमचों की|
चांद सितारे सूरज जब तक टिके हुये हैं अंबर में
रोज रोज दरकार रहेगी अब मालिक के चमचों की|
कल तक जो भटके थे दर दर सड़क छाप मजनूं बनकर
अपनी खुद की कार रहेगी अब मालिक के चमचों की|
अब तो बिन मांगे ही सब कुछ घर में आता रहता है
कोठी भी तैयार रहेगी अब मालिक के चमचों की|
लंदन पेरिस न्यूयार्क में जा इलाज करवायेंगे
जब पत्नी बीमार पड़ेगी अब के चमचों की|
पानी नहीं नहानी में [बाल कविता] - प्रभुदयाल श्रीवास्तव
ReplyDeleteजरा ठीक से देखो बेटे
पानी नहीं नहानी में
तुमको आज नहाना होगा
एक लोटे भर पानी में|
नहीं बचा धरती पर पानी
बहा व्यर्थ बेईमानी में
खूब मिटाया हमने तुमने
पानी यूं नादानी में|
बीस बाल्टी पानी सिर पर
डाला भरी जवानी में
पानी को जी भरके फेका
बिना बचारे पानी में|
ढेर ढेर पानी मिलता था
सबको कौड़ी कानी में
अब तो पानी मोल बिक रहा
पैसा बहता पानी मॆ
कितना घाटा उठा चुके हैं
हम अपनी मनमानी में
नहीं जबलपुर में है पानी
न ही अब बड़वानी में|
पानी नहीं नहानी में [बाल कविता] - प्रभुदयाल श्रीवास्तव
ReplyDeleteजरा ठीक से देखो बेटे
पानी नहीं नहानी में
तुमको आज नहाना होगा
एक लोटे भर पानी में|
नहीं बचा धरती पर पानी
बहा व्यर्थ बेईमानी में
खूब मिटाया हमने तुमने
पानी यूं नादानी में|
बीस बाल्टी पानी सिर पर
डाला भरी जवानी में
पानी को जी भरके फेका
बिना बचारे पानी में|
ढेर ढेर पानी मिलता था
सबको कौड़ी कानी में
अब तो पानी मोल बिक रहा
पैसा बहता पानी मॆ
कितना घाटा उठा चुके हैं
हम अपनी मनमानी में
नहीं जबलपुर में है पानी
न ही अब बड़वानी में|
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Prabhudayal Shrivastava
सूरज के कपड़े
ReplyDeleteकई दिनों से नंगा हूं माँ,
बड़ी लाज अब मुझको आती।
सूरज अपनी माँ से बोला,
क्यों न कपड़े मुझे सिलाती।
पहिले तो छोटा था माँ मैं,
इतनी समझ नहीं थी मुझमें,
इस कारण से पड़ा नहीं था,
कपड़ों के लफड़ों झफड़ों में।
किंतु आजकल मित्र चिढ़ाते,
मुझको बहुत सताते रहते,
मुझे देखकर नंगा नंगा,
जोरों से चिल्लाते रहते।
इस कारण से वस्त्र जरूरी,
हैं मां अब मुझको सिलवाना।
नहीं सिले तो बंद करूंगा,
मैं अब घर से बाहर जाना।
माँ बोली रे प्यारे बेटे,
कैसी तू बातें करता है,।
तुझको नंगा बोल सके यह ,
किसमें दम किसमें क्षमता है।
तू तो जनम जनम से बेटा,
ऐसे वस्त्र पहिनकर आया।
तेरे चमकीले कपड़ों ने,
ही तो दुनियाँ को चमकाया।
तुझे देखते ही दुनियाँ के,
सबके सब नंगे डर जाते।
भाग भाग कर किसी अँधेरे,
कोने में जाकर छिप जाते।
जो तुझको नंगा कहते हैं,
पहिले अपना हृदय टटोलें,
मन के नंगों को क्या हक है,
किसी और को नंगा बोलें।
तन का नंगापन तो केवल,
जरा देर आंखों को चुभता।
मन के नंगेपन से दुनियां
धू धू जलती, विश्व झुलसता।
तन के नंगेपन पर बेटे,
व्यर्थ कभी न रोना धोना।
इतना ध्यान हमेशा रखना,
मन से नंगे कभी न होना।
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